छपाक (Chhapaak)

Chapaak
IMDb 5/10
5/10

परिचय:

 

“छपाक” एक बहुत कीमती और बेहतरीन फिल्म है पीड़िता की चित्कार आपको हिला सकती है ।

“तेजाब पहले दिमाग में आता है , बाद में हाथ में ” , जैसे डायलॉग्स तर्कसंगत लगेंगे।  


जिसकी कोई गलती नहीं उसे ही लोग संदेहास्पद नजरों से देखते हैं , तरस खाते हैं और दूरी बनाते हैं ऐसा रेप विक्टिम के साथ भी होता है।

भीतर की जलन ने तेजाब को अपना माध्यम बनाया। किसी के चेहरे और जीवन को बिगाड़ने की कोशिश की।

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सारांश:

जहाँ तेजाब पीड़िता “मालती ” चेहरा बिगड़ने के बावजूद अपने जीवन और परिवार को ठीक करने की कोशिश में पूरी तरह जुटी रहती है वहीं उसका ठीक-ठाक भाई मदद करने के बजाय नशे की चपेट में आकर उल्टा बोझ बन जाता है और मुश्किलों को बढ़ाता है।

मालती अकेले कई लड़ाइयां लड़ रही होती है , उसका बॉयफ्रेंड भी उसका साथ छोड़ देता है , फिर उसे एक इमानदार महिला वकील और जुझारू पुरुष समाजसेवी का साथ मिलता है।

धीरे धीरे सारी कहानी सामने आती है एक महिला ने ही एक महिला के ऊपर तेजाब फेंका था और एक विभत्स मानसिकता वाला पुरुष मुख्य आरोपी निकला , उसे सजा भी हुई। आसानी से उपलब्ध तेजाब को भी दोषी बनाया गया और उसे भी regularised किया गया ।

Chhapaak review

विश्लेषण :

पुरुष द्वारा महिला पर तेजाब फेंका जाता रहा है।
महिला द्वारा भी महिला पर तेजाब फेंका गया ।
आपने शायद ही कभी यह खबर सुना हो कि “महिला द्वारा पुरुष के ऊपर तेजाब फेंका गया।” 


ऐसा हुआ तो गजब हो जाएगा मानो वर्षों से चली आ रही आपराधिक परंपरा या protocol टूट जाएगा जिस अपराध पर पुरुषों का एकाधिकार हुआ करता था अब उस पर महिलाओं का भी कब्जा होने लगेगा। अपराध तो अपराध है सजा मिलनी ही चाहिए।


पर जहां कहीं भी भीड़ किसी अपराध को लिंग के आधार पर जस्टिफाई करने लगती है तो समझिए की सभ्यता में निष्पक्षता और शिष्टता की निहायत कमी है।

यह फिल्म देखने के बाद दिपिका और उनके सहयोगियों की जितनी तारीफ की जाए कम ही है। दिपिका ने फिल्म को produce भी किया और उसमें acting भी की है।

तेजाब पीड़ित महिलाओं के जीवन को सुधारने के लिए सरकार ने भी कई कदम उठाए होंगे कई स्वयंसेवी संगठन भी होंगे ,पर जब तक खुद पीड़िता अपने जीवन को सुधारने की कोशिश नहीं करेगी ,संघर्षों का सामना नहीं करेगी तब तक उनका जीवन नहीं सुधरेगा।

यह फिल्म जिस किसी भी तेजाब पीड़िता ने देखी होगी निसंदेह उसे मुश्किलों से लड़ने की ताकत मिली होगी । कायदे से इस फिल्म को सपोर्ट करना चाहिए और प्रमोट करना चाहिए हो सके तो टैक्स फ्री भी कर देना चाहिए था। 

ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देख सकें और समाज में सकारात्मक बदलाव हो सके पर बहुत शर्म और अफसोस की बात है की, किसी बहाने से इस फिल्म का विरोध किया गया। पर जिन्हें देखना है वह यह फिल्म देखेंगे ही।

यह कम बजट की बहुत कीमती और बेहतरीन फिल्म है पीड़िता की चित्कार आपको हिला सकती है ।

IMDb 5/10

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