“कहानी की जड़” (Origin of Storytelling )

धरती के सारे जीव जिन चीजों से बने हैं वह है Mind, Body and Soul यानी मन, शरीर और आत्मा। जीवों में मनुष्य यानी इंसान सबसे विकसित जीव माना जाता है।

हर एक इंसान अलग-अलग स्तर से अपने मस्तिष्क यानी मन, शरीर और आत्मा पर काम करता है।

शारीरिक श्रम करने वाले शारीरिक क्षमता अधिक होती है।
मानसिक श्रम करने वालों की मानसिक क्षमता अधिक होती है।
और जिन्होंने अध्यात्म पर काम किया, उन्होंने आत्मा को समझने की कोशिश की। इस कोशिश में दर्शन भी अध्यात्म से जुड़ा हुआ एक विषय के रूप में उभर कर सामने आया।

आध्यात्म की गहराइयों में ना जाते हुए हम यहां से वापस लौटेंगे।

आदि काल से अब तक कई दार्शनिक और अध्यात्मिक चिंतक अथवा विचारक हुए होंगे। हम कुछ ही चिंतकों के नाम हम जानते हैं जिनके बारे में हमने पढ़ा या हमें बतलाया गया है।

पर अभी हम यहां आपके और मेरे जैसे इंसानों की बात करेंगे जिनका नाम विख्यात चिंतकों की लिस्ट में नहीं है।

मेरा मानना है कि हर एक व्यक्ति एक चिंतक होता है, एक विचारक होता है, उसकी अपनी एक दुनिया होती है ,और उस दुनिया की दिलचस्प कहानियां होतीं हैं।

जितने जीवन उतनी कहानियां।

देखा जाए तो दो तरह की कहानियां होती हैं इस क्षण के पहले, जिसे आप इतिहास कर सकते हैं।

और एक इस क्षण के बाद, जिसे आप आने वाली कहानियां या भविष्य कह सकते हैं।

कुछ कहानियों में सत्यता अधिक होती है , कुछ कहानियों में सत्यता कम होती है और कुछ कहानियां कोरी कल्पना होती हैं।

लेकिन कहानियां कब सुनीं, या सुनाई जातीं हैं ?

कहानी के उद्देश्य ( Objectives of Storytelling )

हर एक कहानी के अस्तित्व में आने के पीछे कुछ ना कुछ उद्देश्य होता है।

कुछ कहानियां मनोरंजक होतीं हैं।
कुछ कहानियां प्रेरणादाई होतीं है।
कुछ कहानियां डरावनी लगती हैं।
कुछ रहस्यमई और कुछ रोमांचक।

कहानी का प्रकार और उद्देश्य कुछ भी हो। पर कोई भी कहानी जैसे ही अस्तित्व में आती है। उसी समय श्रोता और वक्ता में एक संबंध कायम हो जाता है।

कहानीकार या कहानीवक्ता का उद्देश्य कुछ भी हो, पर कहानी का अपना खुद का उद्देश्य होता है। वह है श्रोता के दिमाग का भोजन और वक्ता की संतुष्टि।

जिस तरह भोजन को सुपाच्य होने के लिए उसका स्वस्थ्य, ताजा और स्वादिष्ट होना जरूरी होता है। उसी तरह कहानी की सफलता, उसका ताजापन, उसके प्रसंगों का अप्रत्याशित होना और वक्ता द्वारा दिलचस्प रूप से कहानी गढ़ने की क्षमता पर निर्भर करता है।

कथाकार की कसमकश ( Dilemma of Storyteller )

पर श्रोता,अगर कई कहानियां पहले से ही सुन रखी हों तो, वक्ता के लिए कहानी गढ़ना या तो बहुत ही मुश्किल हो जाता है, या फिर बहुत ही आसान।

मुश्किल तब, जब वक्ता श्रोता के स्वादानुसार कहानी ना गढ़ पा रहा हो !
और आसान तब, जब वक्ता, श्रोता के स्वादानुसार कहानी सुनाने को तैयार हो !

हर एक वक्ता, एक श्रोता होता ही है। पर हर एक श्रोता, वक्ता हो जाए ऐसा नहीं देखा गया है।
श्रोता से वक्ता होने की एक ही शर्त है। अगर श्रोता, वक्ता बनना चाहे तो !

और सफल वक्ता होने की सबसे बड़ी शर्त है “दिलचस्पी” यानी “वक्ता किसी कहानी को कितने दिलचस्प ढंग से श्रोता के सामने पेश कर पाता है।”

रहस्यमई दिलचस्पी ( Mystery of Interest )

अब यहीं देखिए, बात कहां से कहां तक आ गई ! और हमें मालूम ही नहीं चला।

अगर आपने अपने शब्दों की यात्रा यहां तक खत्म की हो तो, समझिए की यह छोटी सी यात्रा दिलचस्प ही रही होगी।

लेकिन एक सफल कहानी की एक और “रहस्यमय” शर्त है।…….. चलिए आज के लिए इसे रहस्य ही रहने देते हैं।

पर एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं। की,

"आप की जीवंतता ही आप की कहानियां गढ़ेगीं "

।। इस "जीवंत समय" के पहले कहानियां थी और इसी "जीवंत समय" के बाद भी कहानियां होंगी।।

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *